गुरुवार, ३० नोव्हेंबर, २०१७

अंधश्रद्धा कशाला म्हणावे

खरी अंधश्रद्धा म्हणजे विश्वास..!!!

T.V वर दाखवलेले जाणारे ऍड ( जाहिरात ) ही खरी अंधश्रद्धा पसरवतात.आणि याला बळी पडतात स्वतःला विज्ञानवादी म्हणून घेणारे,
ते कसे तर ,
🔴FEAR LOVALY ( फेयर लवली ) लावल्यावर् माणुस गोरा होतो म्हणे,
आणि याचा वापर विज्ञानवादी लोक आवडीने करतात.अश्या क्रीम लावून जर मानुस गोरा झाला असता तर जगात कोण काळा राहिला च नसता ना?
आता बघा या लोकांनी त्या क्रीम वर् आपली श्रद्धा ( विश्वास )ठेवला.आणि या असल्या भोंदू क्रीम वर हे विज्ञानवादी लोक बळी पडतात .
🤔आता सांगा ही अंधश्रद्धा नव्हे का?अजुन
🔴बोरवीटा ,हॉर्लिक्स ,कोम्पेलन ई.हे पावडर दुधात टाकल्याने म्हणे पोर हुशार होतात .पोरांची बुद्धि तेज होती म्हणे?
आता मला सांगा मग आपल्या भारतीय महात्मानीं कोणता बोरवीटा पिला होता.
उलट भारतीय महात्मा नां नीट पोटभर अन्न हि मिळाले नाही.तरि त्यांची बुद्धि तेज होती.
🤔मग ही अंधश्रद्धा नव्हे का?
आमके सेंट मारल्याने स्त्रियां माघे लागतात..
ही तर पक्की अंधश्रद्धाच आहे. 😰
आणि याचा वापर जास्त विज्ञानवादी लोकच् करतात.
अजुन एक जाहिरात आहे.आपण पाहिली असेल या नसेन् ती जाहिरात अशी की,
एक माणसाला पहाड हुन उडी मरायची होती त्याला भीति वाटत होती आणि त्याला एक साबन सापड़तो आणि तो साबन हा मानुस अंगाला चोळतो .आणि त्याला जोश येतो आणि तो त्या पहाड़ी हुन उडी मारतो.
आता हा तर खरा अंधश्रद्धेचा कळसच झाला.😖
एवढ्या सगळ्या अंधश्रद्धा लोक त्याला मान्य करतात त्या साठी ढिगाने पैसे घालतात .आणि आमच्या साधू -संतानी आखुन दिलेल्या मार्गाला अंधश्रद्धा म्हणतात.😡

मंगळवार, २८ नोव्हेंबर, २०१७

हिंदुराष्ट्र

विश्व में एक या दो नहीं 13 हिन्दू राष्ट्र है, जानिये कौन कौन है यह हिन्दू राष्ट्र ?

जब लोग कहते हैं कि विश्व में केवल एक ही हिन्दू देश है तो यह पूरी तरह गलत है यह बात केवल वे ही कह सकते हैं जो हिन्दू की परिभाषा को नहीं जानते...
वैदिक संध्या
हम कैसे सोए और किस दिशा में सोए। - आचार्य ज्ञान प्रकाश वैदिक
गौहत्या पर प्रतिबन्ध के विरोध में दिए जा रहे कुतर्कों की समीक्षा - डॉ विवेक आर्य

जब लोग कहते हैं कि विश्व में केवल एक ही हिन्दू देश है तो यह पूरी तरह गलत है यह बात केवल वे ही कह सकते हैं जो हिन्दू की परिभाषा को नहीं जानते । इसके लिए सबसे पहले हमें यह जानना होगा कि हिन्दू की परिभाषा क्या है ।




हिन्दुत्व की जड़ें किसी एक पैगम्बर पर टिकी न होकर सत्य, अहिंसा सहिष्णुता, ब्रह्मचर्य , करूणा पर टिकी हैं । हिन्दू विधि के अनुसार हिन्दू की यह परिभाषा नकारात्मक है कि जो ईसाई मुसलमान व यहूदी नहीं है वे सब हिन्दू है। इसमें आर्यसमाजी, सनातनी, जैन सिख बौद्ध इत्यादि सभी लोग आ जाते हैं । एवं भारतीय मूल के सभी सम्प्रदाय पुर्नजन्म में विश्वास करते हैं और मानते हैं कि व्यक्ति के कर्मों के आधार पर ही उसे अगला जन्म मिलता है ।

तुलसीदास जी ने लिखा है परहित सरिस धरम नहीं भाई । पर पीड़ा सम नहीं अधमाई । अर्थात दूसरों को दुख देना सबसे बड़ा अधर्म है एवं दूसरों को सुख देना सबसे बड़ा धर्म है । यही हिन्दू की भी परिभाषा है । कोई व्यक्ति किसी भी भगवान को मानते हुए, एवं न मानते हुए हिन्दू बना रह सकता है । हिन्दू की परिभाषा को धर्म से अलग नहीं किया जा सकता । यही कारण है कि भारत में हिन्दू की परिभाषा में सिख बौद्ध जैन आर्यसमाजी सनातनी इत्यादि आते हैं । 

हिन्दू की संताने यदि इनमें से कोई भी अन्य पंथ अपना भी लेती हैं तो उसमें कोई बुराई नहीं समझी जाती एवं इनमें रोटी बेटी का व्यवहार सामान्य माना जाता है । एवं एक दूसरे के धार्मिक स्थलों को लेकर कोई झगड़ा अथवा द्वेष की भावना नहीं है । सभी पंथ एक दूसरे के पूजा स्थलों पर आदर के साथ जाते हैं । जैसे स्वर्ण मंदिर में सामान्य हिन्दू भी बड़ी संख्या में जाते हैं तो जैन मंदिरों में भी हिन्दुओं को बड़ी आसानी से देखा जा सकता है । 





जब गुरू तेग बहादुर ने कश्मीरी पंडितो के बलात धर्म परिवर्तन के विरूद्ध अपना बलिदान दिया तो गुरू गोविन्द सिंह ने इसे तिलक व जनेउ के लिए उन्होंने बलिदान दिया इस प्रकार कहा । इसी प्रकार हिन्दुओं ने भगवान बुद्ध को अपना 9वां अवतार मानकर अपना भगवान मान लिया है । एवं भगवान बुद्ध की ध्यान विधि विपश्यना को करने वाले अधिकतम लोग आज हिन्दू ही हैं एवं बुद्ध की शरण लेने के बाद भी अपने अपने घरों में आकर अपने हिन्दू रीतिरिवाजों को मानते हैं । इस प्रकार भारत में फैले हुए पंथों को किसी भी प्रकार से विभक्त नहीं किया जा सकता एवं सभी मिलकर अहिंसा करूणा मैत्री सद्भावना ब्रह्मचर्य को ही पुष्ट करते हैं ।

इसी कारण कोई व्यक्ति चाहे वह राम को माने या कृष्ण को बुद्ध को या महावीर को अथवा गोविन्द सिंह को परंतु यदि अहिंसा, करूणा मैत्री सद्भावना ब्रह्मचर्य, पुर्नजन्म, अस्तेय, सत्य को मानता है तो हिन्दू ही है । इसी कारण जब पूरे विश्व में 13 देश हिन्दू देशों की श्रेणी में आएगें । इनमें वे सब देश है जहाँ बौद्ध पंथ है । भगवान बुद्ध द्वारा अन्य किसी पंथ को नहीं चलाया गया उनके द्वारा कहे गए समस्त साहित्य में कहीं भी बौद्ध शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है । उन्होंने सदैव इस धर्म कहा । 

भगवान बुद्ध ने किसी भी नए सम्प्रदाय को नहीं चलाया उन्होनें केवल मनुष्य के अंदर श्रेष्ठ गुणों को लाने उन्हें पुष्ट करने के लिए ध्यान की पुरातन विधि विपश्यना दी जो भारत की ध्यान विधियों में से एक है जो उनसे पहले सम्यक सम्बुद्ध भगवान दीपंकर ने भी हजारों वर्ष पूर्व विश्व को दी थी । एवं भगवान दीपंकर से भी पूर्व न जाने कितने सम्यंक सम्बुद्धों द्वारा यही ध्यान की विधि विपश्यना सारे संसार को समय समय पर दी गयी ( एसा स्वयं भगवान बुद्ध द्वारा कहा गया है । 

भगवान बुद्ध ने कोई नया पंथ नहीं चलाया वरन् उन्होंने मानवीय गुणों को अपने अंदर बढ़ाने के लिए अनार्य से आर्य बनने के लिए ध्यान की विधि विपश्यना दी जिससे करते हुए कोई भी अपने पुराने पंथ को मानते हुए रह सकता है । परंतु विधि के लुप्त होने के बाद विपश्यना करने वाले लोगों के वंशजो ने अपना नया पंथ बना लिया । परतुं यह बात विशेष है कि इस ध्यान की विधि के कारण ही भारतीय संस्कृति का फैलाव विश्व के 21 से भी अधिक देशों में हो गया एवं ११ देशों में बौद्धों की जनसंख्या अधिकता में हैं ।

हिन्दुत्व व बौद्ध मत में समानताएं -

१- दोनों ही कर्म में पूरी तरह विश्वास रखते हैं । दोनों ही मानते हैं कि अपने ही कर्मों के आधार पर मनुष्य को अगला जन्म मिलता है ।

2- दोनों पुर्नजन्म में विश्वास रखते हैं ।

3- दोनों में ही सभी जीवधारियों के प्रति करूणा व अहिंसा के लिए कहा गया है ।

4- दोनों में विभिन्न प्रकार के स्वर्ग व नरक को बताया गया है ।

5- दोनों ही भारतीय हैं भगवान बुद्ध ने भी एक हिन्दू सूर्यवंशी राजा के यहां पर जन्म लिया था इनके वंशज शाक्य कहलाते थे । स्वयं भगवान बुद्ध ने तिपिटक में कहा है कि उनका ही पूर्व जन्म राम के रूप में हुआ था । 6- दोनों में ही सन्यास को महत्व दिया गया है । सन्यास लेकर साधना करन को वरीयता प्रदान की गयी है ।





7- बुद्ध धर्म में तृष्णा को सभी दुखों का मूल माना है । चार आर्य सत्य माने गए हैं ।

- संसार में दुख है

- दुख का कारण है

- कारण है तृष्णा

- तृष्णा से मुक्ति का उपाय है आर्य अष्टांगिक मार्ग । अर्थात वह मार्ग जो अनार्य को आर्य बना दे ।

इससे हिन्दुओं को भी कोई वैचारिक मतभेद नहीं है ।

8- दोनों में ही मोक्ष ( निर्वाण )को अंतिम लक्ष्य माना गया है एवं मोक्ष प्राप्त करने के लिए पुरूषार्थ करने को श्रेष्ठ माना गया है ।

दोनों ही पंथों का सूक्ष्मता के साथ तुलना करने के पश्चात यह निष्कर्ष बड़ी ही आसानी से निकलता है कि दोनों के मूल में अहिंसा, करूणा, ब्रह्मचर्य एवं सत्य है । दोनों को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता । और हिन्दओं का केवल एक देश नहीं बल्कि 13 देश हैं ।

इस प्रकार हम देखते हैं विश्व की कुल जनसंख्या में भारतीय मूल के धर्मों की संख्या 20 प्रतिशत है जो मुस्लिम से केवल एक प्रतिशत कम हैं । एवं हिन्दुओं की कुल जनसंख्या बौद्धों को जोड़कर 130 करोड़ है। है जो मुसलमानों से कुछ ही कम है । व हिन्दुओं के 13 देश थाईलैण्ड, कम्बोडिया म्यांमार, भूटान, श्रीलंका, तिब्बत, लाओस वियतनाम, जापान, मकाउ, ताईवान नेपाल व भारत हैं । इसी कारण जब लोग कहते हैं कि विश्व में केवल एक ही हिन्दू देश है तो यह पूरी तरह गलत है यह बात केवल वे ही कह सकते हैं जो हिन्दू की परिभाषा को नहीं जानते हैं ।

आयुर्वेद कोश ~ नाडी परीक्षा : शास्त्र की मस्करी ??
खुलता कळी खुलेना या मालिकेच्या निमित्ताने 'नाडी' परीक्षा यावर प्रचंड मस्करी सुरु आहे . हवा येऊ द्या सारख्या टाईमपास मालिकेचा शिक्षणाने वैद्य असलेला सूत्रसंचालक सुद्धा नाडी परीक्षा करायची आहे मग विजार /पायजमा कोठे आहे ? असे तद्दन फालतू विनोद विनाकष्ट प्रसवताना दिसून येतो . खुलता कळी खुलेना चा नायक लग्नाचे फेरे घेत असताना होणाऱ्या बायकोचा हात हाती घेतो आणि साहेबाना समजते की या गरोदर आहेत . . त्या दिवसापासून आज अखेर नाडी परीक्षा यावर मस्करी होत आहे आणि पर्यायाने आयुर्वेदाची सुद्धा मस्करी होत आहे . . .
नाडी परीक्षा यास गेल्या पाच एक वर्षात 'अमूल्य ' महत्व आले आहे . जणू काही नाडी परीक्षण हा २०१० मध्ये लागलेला शोधच जणू . रस्त्यावर पाट्या दिसतात 'नाडी तञ् ' , ' नाडी परीक्षण करून निदान ' वगैरे . . आमच्या गुप्तहेरांनी आणलेल्या विश्वसनीय बातमीनुसार काही 'हाय फाय सर्कल ' मध्ये असे 'नाडी वैद्य ' उठबस करतात आणि रग्गड पैसे कमवतात . अर्थात आमचा आक्षेप पैसे मिळवणे यावर नसून तो तुम्ही 'कोणत्या मार्गाने ' ,मिळवता यावर आहे . प्रत्येक वैद्य हा नाडी परीक्षण करत असतो . शतकानुशतके करत आलेला आहे . त्याचा 'बाजार ' मात्र आजवर कोणी मांडला नाही . तो बाजार आज सर्वत्र मांडला जात आहे . मी देखील यथा बुद्धी नाडी परीक्षा करायचा प्रयत्न करतो पण मला नाडी १००% समजते आणि मी नाडी तञ् आहे असे म्हणायचे मी 'धाडस ' करणार नाही . माझा नाडी परीक्षणाचा अभ्यास अजून सुरु आहे .त्यामुळे रुग्णांना आकर्षित करायला मी अर्धसत्य सांगू शकत नाही .
आता नाडी १०० % समजत नाही म्हणजे मी वैद्य नाही किंवा जी रुग्णसेवा करतो त्यात प्रतारणा करतो असे आहे का ?? अजिबात नाही . . .
आयुर्वेदीय रोग निदान आणि रुग्ण परीक्षण हे केवळ 'नाडी ' परीक्षण या एकाच मुद्द्या भोवती एकवटलेले नाही . तसे असते तर आर्ष ग्रंथात ( चरक ,सुश्रुत ,वाग्भट ) नाडी परीक्षण यावर अध्यायांवर अध्याय आले असते . पण तसे दिसत नाही . नाडी परीक्षण यास महत्व लघुत्रयी (भाव प्रकाश , योग रत्नाकर , शारंगधर ) यात दिसून येते . असे असले तरी पूर्वरूप , रूप , संप्राप्ती यात जी रोग लक्षणे आहेत त्यात नाडी अशी लागते असे वर्णन आलेले माझ्या तरी वाचनात नाही . त्यामुळे आयुर्वेदीय निदान म्हणजे केवळ नाडी परीक्षण असे नक्कीच नाही . हे माझे स्पष्ट मत आहे . नाडी , मल , मूत्र , जिव्हा इत्यादींचे समग्र परीक्षण करून , दर्शन , स्पर्शन , प्रश्न याची मदत घेऊन , प्रत्यक्ष , अनुमान आणि युक्ती या प्रमाणांचा वापर करून निदान चिकित्सा करणे यास आयुर्वेदीय पद्धत असे ढोबळमानाने म्हणता येईल .
नाडी परीक्षण हा अत्यंत गुह्य असा विषय आहे . नाडी शिकता येत नाही . शिकवता सुद्धा येत नाही . ती समजावी लागते . ती कोणाला समजते ?? '' नाडी परिचयो लोके प्राय : पुण्येन जायते ' म्हणजे ज्याकडे पुण्य किंवा क्षमता असेल त्याची योग्यता असेल तर नाडी समजते . आता पुण्य म्हणजे काय ?? सकारात्मकतेचा संचय यास पुण्य अशी माझी सोपी व्याख्या आहे . इतरांच्या शरीरात -मनात काय सुरु आहे हे समजायचे असेल तर आधी स्वतःचे मन आणि शरीर स्थिर हवे . हातात रुग्णाची नाडी आणि मनात सकाळी झालेले बायको /गर्ल फ्रेंड सोबतचे 'गेट लॉस्ट .. गो टू हेल ' रुपी प्रेमळ संभाषण असेल तर नाडी सोडाच पण काहीच समजत नाही . इतकी स्थितप्रज्ञता किती लोकांच्या अंगी असते ?? नाडीचा अभ्यास सातत्याने करावा लागतो . . अभ्यास म्हणजे एखादी गोष्ट समजत नाही तोपर्यंत प्रामाणिकपणे वारंवार करणे . . . आमचे महर्षी कणाद नाडी बद्दल काय सांगतात पहा -
प्रमेह रुग्णाची नाडी -जड , सूक्ष्म , ग्रंथिरूप
मांसाहार केला असेल तर - लगुडाकृती (लाकडा समान )
अजीर्ण - कठीण ,जड
अतिसार -शीत इत्यादी
आता यातील जड , सुक्षम , ग्रंथिरूप , लाकडासामान , शीत , कठीण नाडी म्हणजे काय ?? हे समजण्याची जिज्ञासा , क्षमता आणि अभ्यास नसणार्यांनी ' ह्या . . असे काही असते काय ??' अशी मस्करी जरूर करावी . . पण ती करण्याच्या आधी एकदा विषय संबंधी ज्ञान जरूर घ्यावे . .
सध्या सर्वांची 'अवघड जागी दुखणे आणि वैद्य /डॉकटर जावई ' अशी परिस्थिती झाली आहे . चर्चा , सल्ला , अभ्यास न करता टिंगल करणे हे सर्वात सोपे झाले आहे . नाडी कोणी पाहावी , कोणाची पाहावी , कधी पाहावी , कशी पाहावी याचे नियम आणि संकेत आहेत . याची काहीही माहिती नसताना टिंगल करणे हे सभ्यतेला धरून नाही . .
मालिकेची कळी खुलेल की नाही याच्याशी आमचे काही देणे घेणे नाही . . पण नाडी परीक्षा आणि आयुर्वेद याबाबत आदराची आणि विश्वासाची कळी कोमेजू नये म्हणून केलेला हा लहानसा लेखन प्रपंच !!
वैद्य राज यांच्या निरोगी अशा दहा बोटे हाताच्या स्पर्शाने रोग्यास शांती आणि धैर्य प्राप्त होत असते. तीच नाडी परीक्षा स्पर्श हा मानसिक आणि शारीरिक असा दोन प्रकारचा असतो. कारण मन आणि शरीर ही दोन्ही ही सुख- दु:ख यांचे आधार आहेत हा स्पर्श जेथे अपेक्षित आहे. तो भाग म्हणजेच नाडी होय. अर्थात ह्या नाडीच्या रक्तवाहिनिच्या स्पर्शावरून आंतरिक घडामोडी व असंतुलन जाणूनच औषधी दिली जाते. म्हणूनच नाडी परीक्षा आपले  अनन्यसाधारण महत्व ठेऊन आहे. नाडी परीक्षा हि काही जादूविद्या किंवा मांत्रिकविद्या नाही.हे एक शास्त्र-विज्ञान आहे. पण आज असे नाडीवैद्य फारच कमी आहेत. आतातर नाडी परीक्षा हि फक्त केवळ हृदयाचे स्पंदन मोजण्यापुरतीच आहे.
नाडी विज्ञान..

नाडी परीक्षा यालाच आयुर्वेदात नाडीपरीक्षा म्हणतात. हे एक स्पंद्नाचे शास्त्र आहे. शरीर क्रियांच्या मध्ये सर्व क्रिया प्रक्रियांचे ते एक अप्रतिम तंत्र आहे. वैद्य आपल्या हाताची तीन बोटे धमनीवर (नाडीवर) ठेऊन शरीरात होणाऱ्या बदलांचे ज्ञान नाडीच्या स्पंदनावरून करून घेतो. त्याच्या हाताची तीन बोटे प्रत्येकी वेगवेगळी असंतुलन तीन मूलद्रव्ये आहेत. शरीरातील चलन, वलन पाचन, संहनन हे प्रत्येकी वात, पित्त, कफ या दोषांमुळे होत असते. जेव्हा या दोषांच्या प्राकृतीक अवस्थेत बिघाड होतो तेव्हा रोग निर्माण होतात. जेव्हा रोग शरीरात असतो तेव्हा ह्या दोहोंची जी स्थिती असते तिच्या मधील तरतमता, क्षय, वृद्धी यांचे जे स्पंदन असतात ती स्पंदने वैद्य आपल्या बोटांच्या सहाय्याने अनुभूत करतो आणि कोणत्या दोषांचे किती असंतुलन हे लक्षात घेऊन उपचार करतो. वातदोषांचे स्पंदन सापाच्या गती सारखे वेडेवाकडे जाणवते व ते प्राधांन्याने तर्जनी अर्थात अंगठ्याजवळील बोटास स्पंदित होते. मधल्या बोटास पित्ताचे स्पंदन अर्थात बेडकाच्या गती सारखे जंपिंग (टून टून ) असे वरखाली जाणवते. तर कफाचे स्पंदन तीसऱ्या बोटास हंसाच्या चाला सारखे किंवा हत्तीच्या चाली सारखे मंद मंद, हळू हळू असे जाणवते. ह्या स्पंदन गती मध्ये कमी, वाढ, विकृत अतिमंद अतिजमाद किंवा परस्परांमध्ये मिसळून एक अतितीव्र तर दुसरे मंद अशा विविधतेने शरीराच्या दोषस्थिती नुसार स्पंदने असतात आणि वैद्य हि स्पंदने अनुभूत करतो आणि मग ती वात, पित्त, कफ या दोषांच्या प्राकृतिक स्वस्थ कार्यगुणांशी पडताळत झालेल्या बदलांचे ज्ञान करून घेत रुग्णास सांगत असतो. नाडी हे शरिर क्रियेचे स्पंदन आहे. नाडी परीक्षेने रोगाचे मुळ कारण शोधले जाते जर आपण मुळ रोगकारणाची चिकित्सा केली तर मात्र रोग समूळ नष्ट होऊ शकतो. आजच्या विज्ञान नष्ट लोकांना हि नाडी परीक्षा एक थोतांड वाटते. तेव्हा हा काही एक चमत्कार नाही हे एक शास्त्र आहे. नाडी परीक्षा म्हणजे शरीरातील बदलांचे सर्व संकेत अनुभव करते. आज काल बरेच लोक डॉ.कडे येउन वेदना, अस्वस्थता, पचनाच्या तक्रारी, झोप न येणे असा अनेक तक्रारीघेऊन येतात. तेव्हा डॉ. ‘सायक्रोसोमॉटीक’ म्हणून झोपेच्या गोळ्या देऊन बोळवण करतात असे अनेक लक्षणे वा रोग शरीराच्या एका वेगळ्या सूक्ष्म स्तरावरिल असंतुलनाचा परिणाम असतो. आलोचक पित्त असंतुलीत असेल तर डोळ्यांचा त्रास, पाचकपित्तामुळे पचनाच्या तक्रारी, डोकेदुखी बरेचदा तर्पक कफाच्या असंतुलनामुळेही बसू शकते. ह्या आजारात टेस्ट नार्मल असतात. पण रुग्ण मात्र आजारीच असतो. म्हणून यासाठी वात, पित्त, कफ यांचे संतुलन करणे योग्य ठरते. आणि त्यासाठी नाडीस्पंद्नाच्या गतीचेज्ञान लाभकर ठरते. शरीर असंतुलनाची एक सूक्ष्म प्रतिक्रिया जी तयार होते. तिचे प्रदर्शित होण्याचे एक माध्यम म्हणजे नाडी स्पंदने होय. इलेक्ट्रोनिक्सच्या शब्दात बोलायचे झाले तर नाडी ही ‘ट्रान्सड्युसर’ आहे. हे इलेक्ट्रिक उर्जेला म्यकेनीकल ऊर्जेमध्ये परावर्तीत करीत असते. नाडीच्या स्पंद्नातुन वैद्य या मेक्यानिकल उर्जेचे स्पंदन अनुभवीत असतो. हि जी स्पंदित होणारी उर्जा आहे. तिचे स्पंदन यावेळी आपणास इलेक्ट्रोकेमिकल स्पंदनाचे संदेश पोहोचते करीत असतात. शरीरात कुठेतरी अवयवात असंतुलन आहे ते असंतुलन व त्याचे सर्वत्र शरीरात प्रक्षेपण होत असते, त्यामुळे काही विशिष्ट केमिकल्स स्त्रवित होतात. ‘न्युरोट्रान्समीटर’ किंवा ‘न्युरोहार्मोन्स’ रक्ता मध्ये मिसळतात. व सर्वत्र शरीरात संचार करतात. आणि आपला संदेश देतात कि बघा माझ्या लिव्हरमध्ये असंतुलन आहे किंवा कधी कधी असंतुलित अवयव सुद्धा स्वत:आजारी असल्याने संदेश न्युरोनल कनेक्शनद्वारे मुख्य मेंदूला पोचते करीत असतात. हे लिव्हर द्वारा प्रक्षेपित झालेले संदेश आपल्या मधल्या बोटाच्या उजव्या बाजूस तीव्र स्पंदनातील गती समजून घेतो. हे समजून घेणे कठीण असले तरी अनुभवाने सहज शक्य आहे. आपले शरीर प्रत्येक वेळी शरीर स्थितीच्या बदलाचे संकेत व संदेश आपणास देत असतें. आदि प्रत्येकवेळी अव्याहतपणे आपणाशी बोलत असते. तिचे प्रत्येक स्पंदन समजून घेणे आवश्यक असते.
नाडी विज्ञान हे खरे तर स्पर्श विज्ञान होय. आपल्या शरीरातील सूक्ष्मातिसूक्ष्म भाग, शरीरक्रियाआपण प्रत्यक्ष बघू शकत नाही हि शरीरक्रिया बघण्याचे तंत्र म्हणजे नाडीस्पंदन होय. यामध्ये रेडियस स्टायलस त्याखाली मनगटाच्या आतील बाजूस म्हणजेच अंगठ्याच्या मुळाशी आपण कुणीही स्वत:नाडीचे स्पंदन अनुभव करू शकतो. या नाडीच्या स्पंदनाच्या गतीवरून त्या नाडीवर बोटाने कमी अधिक दाब देउन गतीचा बोध करून घेता येतो. त्या ठिकाणी शेकडो संदेशाची स्पंदने असतात. आपणास त्यातील नेमकी असंतुलनाची गती जोखता आली पाहिजे.
आयुर्वेद वात,पित्त,कफ ह्याना शरीराच्या सर्व क्रियाप्रक्रियांना धारण करणारे मूलद्रव्य मानते. या प्रत्येकाचे पुन्हा पाच पाच प्रकार पडतात. वाताचे जसे प्राण, उदान, व्यान, समान, अपान.  पित्ताचे पाचक, रंजक, साधक, आलोचक, भाजक. तर कफाचे अवलंबक, क्लेधक, बोधक, तर्पक, इलेसक असे पाच पाच प्रकार पडतात. हे पंधरा प्रकारचे मूलद्रव्य शरीराच्या सर्व सिष्टीमचे कार्य करतात. जेव्हा जेव्हा ह्यांच्या स्वस्थ कार्यात कमी किंवा अधिकता किंवा विकृती येते तेव्हाच आजार निर्माण होत असतो. आयुर्वेद ग्रंथात या प्रत्येकाची क्षय, वृद्धी, प्रकोप व स्वस्थ कार्याचे वर्णन आहे. वात, पित्त, कफ ह्यांच्या गतीचे ज्ञान नाडीवरून घेण्याचे तीन प्रकार सांगितले आहेत. जसे वाताची नाडी हि सर्पाच्या गती प्रमाणे चालते. जेव्हा अश्या प्रकारची चाल जर नाडीची असेल तर ती नाडी वाताची स्पंदित होत आहे. असे समजल्या जाते. जेव्हा या चालीमध्ये मंदता, तीव्रता किंवा विकृतता असेल तेव्हा त्यांच्या क्षय,वृद्धी,प्रकोप किंवा स्वस्थ कार्यात बिघाड आहे हे गृहीत धरून वैद्य त्यांची ग्रंथात सांगितलेली कार्ये स्मरण करून त्या प्रमाणे त्यामधील असंतुलनाचा बोध करून घेत असतो. तसेच पित्ताची नाडी हि उड्या मारत चालणारी खाली-वर होणारी किंवा बेडकाच्या चालीसारखी असते. कफाची नाडी हि मंद हळूवार वाहणारी जसे हंसाच्या गती सारखी असते. स्वस्थ गतीची वात, पित्त, कफ नाडीची गती ओळखता येऊ लागली की विकृत किंवा असंतुलीत नाडीची गतीहि जोखता येते. वैद्य तर्जनी, मध्यमा, अनामिका या तिन्ही बोटांनी ह्या नाडीच्या गतीचे स्पंदन वात, पित्त, कफ असे अनुभवीत असतो.
नाडी परीक्षा वेळ :  नाडी परीक्षा सकाळच्या वेळेला केली पाहिजे. नाडी परीक्षेपूर्वी काही काळ शांत बसून केल्या जाते. दिवसभऱ्याच्या कामाच्या श्रमाने नाडी स्पंदन वाढतात. पण आजच्या काळात नाडी परीक्षेसाठी सकाळी येणे कोणासही शक्य होत नाही.अश्या वेळी वैद्य रुग्णास काही काळ शांत बसण्यास सांगून मगच नाडी परीक्षा करतात. रोगनिदान करण्यासाठी नाडीपरीक्षा करताना जेवणा नंतर, झोपले असताना, स्नान झाल्यांनतर, उन्हातून फिरून आल्या नंतर, व्यायाम झाल्यावर,उपवास असल्यास किंवा मद्यपान केलेले असल्यावर नाडी परीक्षेचे ज्ञान चुकीचे होतात.
नाडी परीक्षा विधी:
वैद्य डाव्या हाताने रुग्णाचा उजवा हात मनगटाच्या सांध्याजवळ धरून आपल्या उजव्या हाताची तीन बोटे नाडीवर ठेऊन नाडीच्या गतीचे ज्ञान करून घेत असतो ह्यावेळी प्रथम बोटांनी सर्वसाधारण स्पर्श केल्यानंतर थोडा दाब देऊन व त्यानंतर अधिक दाब देऊन पुन्हा पुन्हा स्पर्धा करून शारीरिक असंतुलनाचा अभ्यास घेऊन निर्णय घेत असतो.स्त्री रुग्णाची डाव्या हाताची नाडी बघितली जाते. तर पुरुष रुग्णास उजव्या हाताची नाडी बघावी लागते.
स्वस्थ नाडी लक्षण:
ज्या नाडीची गती स्पष्ट आहे, आपल्या स्थानी व्यवस्थित स्पंदन करीत असेल तर तिच्यामध्ये अती चंचलता किंवा अती मंदता नसेल तर ती स्वस्थ नाडी होय. नाडीची गती सकाळच्यावेळी स्निग्धतापूर्ण दुपारी उष्णतायुक्त सायंकाळी धावमाना तेज तर रात्री वेगरहित गतीचे स्पंदन होत असते. लहान मुलांमध्ये कफाची गती,तारुण्यात पित्ताची,तर वृद्धावस्थेत वाताची गती प्राधांन्याने असते.
नाडीस्पर्श:
पित्त नाडीचा स्पर्श उष्ण,कफ नाडीचा स्पर्श शीतल तर वात नाडीचा स्पर्श अनुष्णशीत (समसमान) असते. वात नाडी वक्र गतीने ,पित्त नाडी उडया मारत, तर कफ नाडी मिश्रित लक्षणांची असते. ह्यातील परस्परात मिळूनगती येत असेल तरत्याला द्वंद्न नाडी म्हटले आहे.तिन्हि दोष बिघडलेले असतील तर सर्व गतीचे स्पंदन होते.
वेगवेगळ्या आजारातील नाडी स्पंदन:
ताप -: हात-पाय दुखत असतील तर नाडी मंद चालते. जर ताप अधिक असेल तर नाडीचे स्पंदन वाढतात. नाडीचा स्पर्श गरम लागतो.
अजीर्ण -: अजीर्ण झाले असता नाडी कठीण आणि चहू बाजूने जखडल्या सारखी चालते. मंद-मंद दुर्बल असते.
मुळव्याध -: यात नाडी कधी मंद, कधी वक्र तर कधी मृदू गतीने चालते.
मलावरोध -: मलावरोध असेल तर नाडी बेडका सारखी उडया मारत चालते.
आमवात -: ह्यात नाडीची गती स्थिर व निश्चित अशी चालते.
उदरशूल -: ह्यात नाडी वक्र गतीने व वेगाने चालते.
कृमी -: पोटात जंत झाले असतील तर नाडी तिन्ही गतीने चालते.
कावीळ -: ह्यात नाडी उष्ण गुणाने व बेडकाच्या गतीने चालते.
मधुमेह -: नाडी गाठीसारख्या स्पर्शाची चालताना वाटते व सुक्ष्म गतीची जाणवते

जमिनीतील पाणी शोधाच्या परंपरागत पद्धती

जमिनीतील पाणी शोधाच्या परंपरागत पद्धती
भौगोलिक रचनेप्रमाणे जमिनीच्या आतील पाण्याचे ओहोळ कसे वाहतात, कुठे एकत्र मिळतात, पाणी कुठे - कसे साठविले जाते, हे विहीर - कूपनलिका खोदताना शोधणे महत्त्वाचे आहे. या साठवणुकीतच विहीर - कूपनलिका खोदली, तर हमखास पाणी लागते. पाणाडे अशा पाण्याचा शोध पारंपरिक पद्धती वापरून घेत असतात.
_*- डॉ. शंकर उमाळे*_
जमिनीवर पडलेले पाणी प्रथम जमिनीत जिरते. मातीच्या मगदूर व जमिनीच्या उताराप्रमाणे अतिरिक्त पाण्याला गती मिळते. जमिनीची धूप; ओहोळ, नाले, नदी यांच्या निर्मितीचे मूळ कारण पाण्याला मिळालेली गती हेच आहे. पाणी जमिनीवर वाहताना पृथ्वीचे गुरुत्वाकर्षण त्याला आकर्षित करते व त्यामुळेच झरे, कूपनलिका, विहिरी यांना पाणी मिळते. भौगोलिक रचनेप्रमाणे जमिनीच्या आतील पाण्याचे ओहोळ कसे वाहतात, कुठे एकत्र मिळतात, पाणी कुठे - कसे साठविले जाते हे शोधणे महत्त्वाचे आहे. या साठवणुकीतच विहीर खोदली तर हमखास वर्षभर पिण्याचे पाणी मिळेल. नेमके हे ठिकाण शोधणाऱ्यास वॉटर विचर्स किंवा पाणाडे म्हणतात. पाणाडे जमिनीतील पाण्याचा शोध कसा घेतात, ते आपण पाहू.
🍃 *भूगर्भ व नैसर्गिक वनस्पतींचा अभ्यास* 🍃
डोंगराळ, उंच - सखल भाग, पाण्याने माती वाहून गेलेले खडक, दगड - रेती उघडी पडलेली ओसाड जमीन; तसेच जिथे मातीची साठवण होते ती सुपीक जमीन पाण्याची गती किंवा अडवणुकीप्रमाणे तयार होते. पाणी, अन्नद्रव्यांच्या उपलब्धतेप्रमाणे त्या भागात झाडे - वनस्पती उगवत असतात. चुकीच्या जागेवर उगवलेल्या वनस्पतीची वाढ समाधानकारक होत नाही. विशेषतः औदुंबर, ताड, सिंदी, वासन, मंदार, शमी, हरियाली, लव्हाळ, जामून इत्यादी झाडे - वनस्पती पाण्याच्या आश्रयाने चांगल्या वाढतात. म्हणून अशा झाडांजवळ पाणी निश्‍चित असते. मुंग्यांची वारुळेसुद्धा पाण्याच्या जवळपास असतात. माळरानात सहसा झिरोफाइट्‌स जसे निवडुंग, काटेरी झुडपे, कोरफड, खुरटे गवत अशा प्रकारच्या कमी पाण्याची गरज असणाऱ्या वनस्पती उगवतात. या भागात पाणी नसते याची जाणीव पाणाड्यांना असते.
🎋 *"वाय' आकाराच्या झाडाच्या फांदीचा प्रयोग* 🎋
पेन्सिलच्या जाडीची, लवचिक, ताजी, "वाय' आकाराची विशेषतः उंबर, जामून, मेंदी या झाडांच्या फांदीचा उपयोग पाणी शोधण्यासाठी होतो. पाणाड्या ही फांदी दोन्ही हातांनी छातीजवळ धरून "वाय'चे खालचे टोक समोर करून जमिनीवर चालतो. चालताना एखाद्या ठिकाणी फांदी विशिष्ट धक्का देते, या धक्‍क्‍यांची जाण ठेवून जमिनीतील भरपूर पाण्याचे ठिकाण ठरविता येते.
📍 *लोलक -* 📍
लोलक पाच ग्रॅम वजनाचा कोणत्याही धातूचा बनविलेला असतो. याच्या वरच्या बाजूने एक- दोन फूट लांबीचा दोरा बांधलेला असतो. त्याची खालची बाजू अणकुचीदार असते. लोलकाचा दोरा हातात धरून पाणाडे शेतात सावकाश चालतात. लोलक पाण्याची दिशा दाखवितो, त्या दिशेनेच चालताना एखाद्या ठिकाणी लोलक गोलगोल फिरतो. या ठिकाणी पाणी असते. दोऱ्याची लांबी व लोलकाची फिरण्याची गती यावरून पाण्याची खोली व पाण्याचे प्रमाण निश्‍चित करता येते. हा प्रयोग कमी खर्चाचा; पण अनुभवावर आधारित आहे.
🌰 *नारळाचा प्रयोग* 🌰
प्रथम शेतात मध्यभागी जमिनीवर एक टोपले उपडे ठेवून त्यावर दुसरे टोपले सरळ ठेवावे. सरळ टोपल्यात एका मुलाला बसवून त्याच्या दोन्ही हातांत एक नारळ द्यावा व त्याचे डोळे बंद करून घ्यावेत. दुसऱ्या मुलाच्या दोन्ही हातांत नारळ देऊन त्याला पहिल्या मुलाला केंद्रबिंदू मानून त्याच्या भोवती वर्तुळाकार फिरविले जाते. फिरण्याची त्रिज्या वाढवत वाढवत पूर्ण शेत फिरविले जाते. प्रथम केंद्रबिंदूतील मुलगा स्थिर असतो. फिरणारा मुलगा पाण्याच्या जागेवर आला की केंद्रबिंदूतील मुलगाही हलतो किंवा फिरतो. ज्या ठिकाणी फिरणाऱ्या मुलामुळे केंद्रित मुलाची सहज व जास्त हालचाल होते, त्या ठिकाणी फिरणारा मुलगा थांबतो. जिथे मुलगा थांबतो, ती जमिनीतील पाण्याची जागा निश्‍चित होते. जिथे केंद्रित मुलगा फिरणाऱ्या मुलासोबत फिरतो त्या परिघात भरपूर पाणी असल्याचे समजावे.
🦀 *पाणी आवडणारे प्राणी प्रयोग* 🦀
याकरिता मोठे बेडूक, खेकडे वापरतात. हे प्राणी बहुसंख्येने आणून सूर्यास्तानंतर शेतीच्या मध्यभागी मोकळे सोडावेत. ते रात्री पाण्याच्या शोधात जमिनीवर हिंडतात, सूर्योदयापूर्वी हे प्राणी जिथे एकत्रित होतात, ती जागा निश्‍चित पाण्याची असते. खेकडे पाणी असलेल्या ठिकाणी जमीन कोरण्यास सुरवात करतात. शेतीत पाणी नसल्यास हे प्राणी इतरत्र पळून जातात. कोरड्या विहिरीत भरपूर खेकडे व त्यांचे अन्न पुरवल्यास हे खेकडे या विहिरी सजल करतात, असा अनुभव आहे.
🌩 *आकाशातील वीज* 🌩
उच्च दाबाची कडाडणारी वीज ओल्या जमिनीकडे प्रकर्षाने आकर्षित होते. पावसाळ्याच्या सुरवातीला ज्या ठिकाणी जमिनीवर वीज पडते, त्या ठिकाणी जमिनीत भरपूर पाणी असते. जमिनीवर धातूचा साठा, उंच झाड, उंचवटा याचा विचार करणे गरजेचे आहे.
🎛 *स्ट्रेटा रेजिस्टीवीटी मीटर* 🎛
हे विजेच्या बॅटरीवर चालणारे यंत्र आहे. या यंत्रात चार धातूचे इलेक्‍ट्रोड, बॅटरी, मायक्रो व्होल्ट मीटर, मायक्रो ऍमीटर व इलेक्‍ट्रोड जोडणारी इन्सुलेटेड वायर, पाणी, एक तंत्रज्ञ व चार- पाच मजूर लागतात. प्रथम ऍमीटर, बॅटरी व इलेक्‍ट्रोड वायरने जोडतात. इलेक्‍ट्रोड जमिनीत खोचून पाणी घालून मातीचा व इलेक्‍ट्रोडचा संबंध पक्का करतात. त्याप्रमाणे ऍमीटर प्रवाह दाखविते. ऍमीटर इलेक्‍ट्रोडच्या अगदी मध्यभागी 10-20 फूट अंतरावर दोन इलेक्‍ट्रोड जमिनीत खोचून पाणी दाब दाखविते, त्याची नोंद करतात. नंतर ऍमीटर इलेक्‍ट्रोड मधील अंतर बदलून ऍमीटर व व्होल्ट मीटरच्या अंतराप्रमाणे अनेक नोंदी करतात. जसजसे ऍमीटर इलेक्‍ट्रोडचे अंतर वाढते तसातसा वीज प्रवाहास अडथळा होतो; पण ज्या ठिकाणी भरपूर पाणी असते तेथे वीज प्रवाहास अडथळा येत नाही. कारण वीज पाण्यातून सहज वाहते. जेथे वीजप्रवाह खंडित होतो तेथे विनापाण्याचा अभेद्य खडक आहे, असे मानण्यात येते. हा प्रयोग महागडा असून जमिनीतील खनिज संपत्ती, लोखंडी पाइप लाइन चुकीचे मार्गदर्शन करतात. म्हणून तज्ज्ञ व्यक्तीकडून व यंत्र प्रमाणित करूनच वापरावे.
📲 *अधिक माहितीकरिता संपर्क-*
- डॉ. शंकर उमाळे, 9421667719
(लेखक डॉ. पंजाबराव देशमुख कृषी विद्यापीठातील निवृत्त प्राध्यापक व संशोधक आहेत.)
📚 *स्ञोत-* एग्रोवन

पाण्याचा शोध

छत्तीसगडच्या रायपूरमध्ये कृषी विभागात कार्यरत असलेले बी. डी. गुहा यांनी आश्चर्यकारक पद्धतीनं नारळाच्या साहाय्यानं रक्त गट शोधण्याची नवीन पद्धत शोधून काढलीय. कोणत्याही व्यक्तीला स्पर्श न करता केवळ १० सेकंदांमध्ये या पद्धतीनं व्यक्तीचा रक्तगट सांगता येतो.
तसं पाहिलं तर आत्तापर्यंत नारळ केवळ मंदिरांमध्ये फोडण्यासाठीच वापरलं जायचं... याच नारळाच्या साहाय्याने एखाद्या व्यक्तीचा रक्त गटही सांगता येऊ शकतं, यावर कुणाचा विश्वासही बसणार नाही. पण, गुहा यांच्या दाव्यानुसार, याच नारळाच्या साहाय्याने सिलिंडर भरलेला आहे की रिकामा किंवा जमिनीखाली पाणी आहे किंवा नाही... किंवा जमिनीखालील सुरंग शोधून काढता येऊ शकतात.
व्यक्तीचे आठ रक्त गट ए पॉझिटीव्ह, ए निगेटीव्ह, एबी पॉझीटीव्ह, एबी निगेटीव्ह, बी पॉझिटीव्ह, बी निगेटीव्ह, ओ पॉझिटीव्ह आणि ओ निगेटीव्ह असतात. गुहा यांच्या म्हणण्यानुसार, यातील पाच रक्त गट ए पॉझिटीव्ह, एबी पॉझीटीव्ह, बी पॉझिटीव्ह, ओ पॉझिटीव्ह आणि ओ निगेटीव्ह केवळ नारळाच्या साहाय्यानं ते ओळखू शकतात. इतर तीन रक्त गटांच्या बाबतीत शोध अजून सुरू आहे.
वेगवेगळ्या रक्त गटांच्या बाबतीत नारळ वेगवेगळ्या दिशेनं का फिरतो, यामागच्या वैज्ञानिक कारणाचा ते सध्या शोध घेत आहेत. या कामात त्यांना त्यांच्या मुली सोनाली, मोनाली आणि मुलगा आयुष मदत करतोय. कम्प्युटर सायन्समध्ये इंजिनिअरिंग करणारे गुहा यांचे तीनही मुलांना यामागचं वैज्ञानिक कारण लवकरच शोधून काढता येऊ शकतं, असा विश्वास आहे.
नारळाच्या साहाय्याने कसा समजतो रक्तगट
गुहा यांच्या म्हणण्यानुसार, व्यक्तीच्या डोक्याच्या थोडं वरती हातात नारळ द्यावा. थोड्याच वेळात नारळ वेगळ्या दिशेला फिरतो. ज्या जागेवर भूमिगत पाणी किंवा पाण्याची पाईपलाईन तिथे मात्र नारळ योग्य दिशा दर्शवण्यात असमर्थ ठरतो.
ए पॉझिटीव्ह रक्त गट असेल तर नारळ ४५ डिग्री अंश कोनात वळतो. एबी पॉझीटीव्ह असेल तर ४५ ते ५५ डिग्री, बी पॉझिटीव्ह असेल तर ६० डिग्री, ओ पॉझिटीव्ह असेल तर ९० डिग्री आणि ओ निगेटीव्ह असेल तर १८० डिग्री अंश कोनात वळतो.
कसा लागला हा शोध
गुहा सांगतात, २००५ साली बलौदाबाजारमधल्या एका शाळेत पाण्याचा स्रोत सांगण्यासाठी त्यांना पाचारण करण्यात आलं होतं. `तेव्हा काही लहान मुलं खेळत होती... त्यांचा दंगा थांबविण्यासाठी मी त्यांना एका रांगेत उभं राहायला सांगितलं... आणि म्हटलं की मी पत्ता लावतो, तुमच्यात पाणी आहे की नाही....`
`गंमतीमध्ये केलेल्या या परीक्षणादरम्यान पाहिलं तर काही मुलांच्या डोक्याच्या थोडं वरती हातात ठेवलेलं नारळ ९० डिग्रीमध्ये उभं राहिला. मी हाच प्रयोग घरी येऊन माझ्या मुलांवर करून पाहिला. तेव्हाही तेच झालं. लॅबमध्ये मुलांचा रक्त गट तपासला तर तो ओ पॉझिटीव्ह निघाला... आणि माझी चिकित्सक बुद्धी आणखी कामाला लागली,` असं गुहा यांनी म्हटलंय.

सोमवार, २७ नोव्हेंबर, २०१७

आर्यभट


आर्यभट्ट

(पाचव्या शतकात सूर्य- चंद्राचे वेध घेणारा महान भारतीय शास्त्रज्ञ)
इ. स. ४७६                                                              (भारत)
      भारताने आर्यभट्टाची जागतिक श्रेष्ठता कशी आजारामर केली?
भारतामध्ये पाचव्या शतकात एक अलौकिक खागोलशास्त्रज्ञ होऊन गेला, अशी सर्वसाधारण माहिती काही अभ्यासू भारतीयांना होती; परंतु आर्यभट्टाचे संशोधन किती महत्वाचे होते यासंबंधी बहुसंख्य भारतीय पूर्णपणे अंधारात होते. प्राचीन काळापासून भारतीय शास्त्रज्ञांची एक अद्वितीय परंपरा होती व आहे; पण सर्वसाधारण नागरिकांना या गोष्टींची काहीच कल्पना नसते! भारताने आपल्या पहिल्या उपग्रहाला आर्यभट्टहे नाव दिले, तेव्हा मात्र लोकांना याविषयी जाग आली व आर्यभट्टाने कोणत्या प्रकारचे शास्त्रीय प्रयोग केले व भारताचे नाव जागतिक शास्त्रज्ञांच्या मालिकेत कसे नेऊन बसविले हे जाणून घेण्याची उत्सुकता निर्माण झाली. परंतु तरीही अशा जिज्ञासेचा पाठपुरावा करून संपूर्ण अथवा अंशतः माहिती मिळविण्याइतका उत्साह, तत्परता, किती भारतीयांमध्ये आहे, याचा उहापोह कारणाचे हे स्थळ नव्हे. मात्र खागोल विज्ञानात भारतीय नागरिक धार्मिक भावनेमुळे व वृथा अंधश्रद्धेमुळे जगाच्या मागे राहिले व अजूनही फार मोठ्या प्रमाणात आपला देश याबाबतीत अंधश्रद्धेने ग्रासलेला आहे हे कटू सत्य होय.
राहू वा केतू यांनी ग्रासल्यामुळे सूर्य, चंद्र यांना ग्रहण लागते या कल्पनेवर विश्वास असलेले लक्षावधी भारतीय नागरिक या ग्रहण काळात दे दान सुटे गिरान या गर्जनांचा ऐकू घेणारा घोष हे काय दर्शवितात? मागे झालेल्या खग्रास सुर्यग्रहणापासून मुंबईसारख्या सुजान शहरातील लाखो सुबुद्ध नागरिकांना कड्या-कुलुपांच्या बंदोबस्तात कोंडून ठेवणाऱ्या धार्मिक नेत्याकडे पाहिले असता, आर्यभट्ट नावाच्या एका भारतीय शास्त्रज्ञाने १५०० वर्षापूर्वी भरसभेत सूर्यग्रहण व चंद्रग्रहण यासंबंधी प्रात्यक्षिक दाखवून निरुपण केले व थोड्याच अवधीत आर्यभटीका हा ग्रंथही प्रकाशित केला यावर कोणाचा विश्वास बसेल का ?
पृथ्वी, चंद्र, सूर्य यांची भ्रमण गती व परिभ्रमण गती यासंबंधी स्पष्ट काल्पना ज्याने त्या काळात मांडली, त्याचे नाव भारताच्या पहिल्या उपग्रहाला दिले जावे हे सर्वथैव उचित आहे.